कोरोना महामारी के सम्बंध में अपने पहले लेख में हमने चर्चा की थी कि आखिर इस आपदा से क्या सबक लेने की जरूरत है?और इसी क्रम में आज राम मंदिर स्थापना दिवस के पावन दिवस पर इस त्रासदी से लड़ने के लिए रामराज्य की धारणा की प्रासंगिकता पर चर्चा महत्वपूर्ण हो जाती है। क्योंकि रामराज्य की यह धारणा इस मूल विचार पर आधारित है कि-
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥
अर्थात रामराज्य' में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं व्यापते। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और मर्यादा में रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं।
आज कोरोना महामारी दैहिक,दैविक और भौतिक ताप को ही तो बढ़ा रही है।दैहिक क्योंकि यह तेजी से मनुष्यों में फैलने वाला जानलेवा विषाणु है,दैविक क्योंकि यह एक आपदा के रुप में पूरी मानव जाति के अस्तित्व को ही संकट में डाल रही है और भौतिक क्योंकि इसने बड़े स्तर पर पलायन,गरीबी,लाचारगी को बढ़ावा दिया है।
तो फिर रामराज्य में ऐसा क्या था जो इन समस्याओं का समाधान देता है....असल मे रामराज्य केवल सरकार केंद्रित धारणा नही है,बल्कि रामराज्य में शासन में शासक भी भगीदार है और जनता भी,यह मनुष्यों के लिए भी है और पशुओं के लिए भी,इसमें अभिजन के हित भी है और आमजन के भी।गौर करने वाली बात है कि हम रामराज्य की धारणा पर बल देते है रामराज पर नही, क्योंकि रामराज की धारणा की बात करेंगे तो यह व्यक्ति केंद्रित शासन का द्योतक होगा,जहाँ शासक के इर्द गिर्द ही शासन के सभी कार्य संपादित होते है जबकि रामराज्य की धारणा व्यवस्था केंद्रित है....ऐसी व्यवस्था जो समतामूलक और शोषणमुक्त समाज पर आधारित हो...ऐसी व्यवस्था जहां सामूहिक कल्याण आदर्श भी है और व्यवहार भी।ऐसी व्यवस्था जो गांधीजी के शब्दों में अंत्योदय से सर्वोदय पर आधारित हो।जहाँ कानूनों की बाध्यता नही बल्कि नैतिक आचरण की उच्चता से समाज संचालित होता है।
यह गवर्नेंस का वह उच्चतर मॉडल है,जहाँ प्रत्यक्ष जनसहभागिता और प्रत्यक्ष जनसवांद पाया जाता है।यह जनता के स्वतः स्फूर्त अनुशासन से संचालित होता है।गांधी जी इसे स्वराज्य की धारणा के रुप में देखते है यानी रामराज्य किसी बाह्य सत्ता के दबाव नही बल्कि स्व नियंत्रण से संचालित होता है,जहाँ लोगो मे कायिक,वाचिक,मानसिक समरूपता बनी रहती है।निश्चय ही यह सद्भावना,सहयोग और साझेपन से ओत प्रोत सामंजस्य है।
रामराज्य में वंचित की आवाज भी है और प्रकृति का साहचर्य भी।रामराज्य का आधार उस आसुरी शक्तियों पर विजय पर टिका है,जो समाज के वंचितों और तथाकथित कमजोर समूहों के सहयोग से निर्मित सेना के जरिये लड़ी गयी।यह संदेश है कि केवल शासक के प्रताप से नही बल्कि आमजनता के सहयोग से बड़ी लड़ाइयां जीती जाती है।यह किसी व्यक्ति के विजय की गाथा नही बल्कि समाज के सामूहिक पराक्रम और विजय की गाथा है।
इसलिए कोरोना जैसी आपदा से निपटने के लिए आज रामराज्य की धारणा को स्वीकार करने की जरूरत है...यह व्यवस्था, सरकार,आम जनता हर एक स्तर पर हमें समझना होगा।
एक ऐसी व्यवस्था जो मानवीय समुदाय और प्रकृति के अन्य तत्वों के सहचर्य पर आधारित हो, रामराज्य की ऐसी धारणा का ही चित्रण तुलसीदास जी ने किया है-
फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहिं एक सँग जग पंचानन।।
खज मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई।।
कूजहिं खग मृग नाना बृंदा। अभय चरहिं बन करहिं अनंदा।।
सीतल सुरभि पवन वह मंदा। गुंजत अलि लै चलि मकरंदा।।
आज हमारी व्यवस्था में एक विरोधाभासी दुष्चक्र की झलक दिखाती है,जहाँ एक देश के रूप में हम निरन्तर मजबूत हुए है,पर क्या विकास का लाभ समाज के हर हिस्से तक पहुंच रहा है?लॉकडाउन के बाद सड़को पर निकले प्रवासी मजदूरों की तस्वीर मन को व्यथित करने वाली है।हालांकि सरकार द्वारा व्यापक स्तर पर प्रयास किये जा रहे है।इसीलिए तुलसीदास जी रामराज्य में शासक की भूमिका का वर्णन करते हुए कहते है-
मुखिया मुख सो चाहिए, खान पान को एक
पालै पासै सकल अंग,तुलसी सहित विवेक।
अर्थात शासक मुँह के समान होना चाहिए।जैसे मुह खाने पीने का काम करता है और शरीर के सभी अंगों का पालन पोषण करता है।उसी प्रकार शासक को भी विवेकवान होना चाहिए और वह ऐसे काम करे जिससे सभी जन का कल्याण हो सके।आज जबकी यह महामारी तेजी से बढ़ रही है तो ऐसे में लोगो की आशाएं और अपेक्षाएं सरकार से बढ़ चुकी है और सरकार को उनके भरोसे पर खरा उतरना ही चाहिए।इसलिए पक्ष विपक्ष की पॉइंट स्कोरिंग राजनीति से आगे बढ़कर देश मे साझेपन की सरकार दिखनी चाहिए।
इन सबमे आम नागरिकों की भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।क्योंकि रामराज्य की मूल धारणा जनभागीदारी पर ही केंद्रित थी...एक अनुशासित समाज ही सामूहिक रूप में बेहतर जीवन की दिशा तय कर सकता है।आज धर्म,जाती,क्षेत्र नही बल्कि एक साझे अस्तित्व के रूप में संगठित होने की जरूरत है...अपनी जवाबदेहिता हमे खुद से सुनिश्चित करनी होगी।समाज मे बीमार मानसिकता के लोग भी है,जिन्हें अलग थलग करना होगा।हमे नकारात्मकता को पराजित करना होगा।यह समझना होगा कि परमार्थ ही स्वहित की उन्नति का मार्ग है....इसलिये आइए साझे बन्धुत्व की भावना से ओत प्रोत रामराज्य के आदर्श को फिर से स्वीकार करे।
क्रमशः
