कोरोना के कारण जब पूरे देश मे जब सरकार का लॉकडाउन लगाया था, तब के विशेषज्ञों ने ये दावा किया था कि अर्थव्यवस्था को जो झटका लगा उससे ये कभी उबर नही सकेगी। इसके बाद जब देश की दूसरी तिमाही में देश की अर्थव्यवस्था में जब देश की अर्थव्यवस्था ने 23.9% नेगेटिव दर्ज की गई तो इन रितेश पांडे के दावों को और बल मिल गया और इन्होंने उम्मीद जताई कि भारत की अर्थव्यवस्था एक लंबे समय के लिए मंडी के चपेट में चली जाएगी।
हैरानी तो तब होती है जब भारतीय मीडिया में ऐसे तथाकथित आज भी ऐसी बातें करते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या वह कभी आकड़ो को उठाकर देखने का कष्ट भी करते है, या इन्हें सिर्फ और सिर्फ नेगेटिव ग्रोथ ही दिखाई देती है। लॉकडाउन के कारण देश मे सभी आर्थिक गतिविधियों के बंद होने के कारण यह स्वभाविक था कि देश की जीडीपी में गिरावट होगी ही होगी। ऐसे में जब दूबारा आर्थिक गतिविधिया शुरू हुई है, वैसे दूबारा से देश की अर्थव्यवस्था भी तेजी पकड़ने लगी है।
जब हम आकड़ो पर गौर करे तो कुल 12 लाख कंपनियां से इतर अगर देश के करीब 6 करोड़ msme यूनिट्स और कृषि सेक्टर पर अगर नज़र डाली जाए, तो यह साफ दिखता है कि देश की अर्थव्यवस्था वाकई में रफ्तार पकड़ रही है। उद्धरण के तौर पर देखा जाए तो अप्रैल से लेकर सिंतबर महीने के दौरान देश के कृषि छेत्र में एक्सपोर्ट में करीब 43% की बढ़ोतरी देखने को मिली है। भारत इस वक़्त आईटी, फार्मा और कृषि छेत्र में बेहतर प्रदर्शन कर रहा है और लगभग लॉकडाउन के समय मे भी इन सभी छेत्रो ने अपना बेहतर ही प्रदर्शन किया था जिसके कारण कुछ ही महीनों ही भारत net एक्सपोर्टर देश बन गया है। और अभी लॉकडाउन के बाद अब देश मे MSME सेक्टर ने दोबारा से तेज़ी पकड़ी है, जो भारत के कृषि के बाद सबसे ज्यादा रोज़गार प्रदान करता है। लेकिन हमारे देश के तथाकथित एक्सपर्ट्स इसपर ध्यान नही देते या देने की जरूरत नही समझते।
MSME सेक्टर के आंकड़े भले ही कम उपलब्ध हो, लेकिन ये सेक्टर पूरे देश की इकोनॉमी में करीब 30% का योगदान देता है। इस सेक्टर में जुड़ा हर उद्योग लगभग 15 से 20 लोगो को ही रोज़गार उपलब्ध करा पाता है, लेकिन यह संख्या मिलकर करोड़ो में पहुँच जाती है।
