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व्यंग्य:नेहरू रईस थे इस लिए चीन को ज़मीन दी, गरीब तो मोदी है इसलिए लड़ झगड़ रहे है।

नेहरू जी का ठीक था। वो इन सब पचड़ों में पड़ते ही नहीं थे। जितनी जमीन चाहिए, ले लो और मामला खत्म करो। पीओके चाहिए? ले लो! अक्साई चिन चाहिए? ले लो!


मतलब हर मामले में रईसी टपकती थी उनके पोर-पोर से। अब जो गरीब मानसिकता के लोग हैं, वो तो इसे सरेंडर करना ही कहेंगे। उनको पता ही नहीं कि रईसी होती क्या चीज है। रईसी उस आदमी से समझनी चाहिए जो एक बार मुझे ट्रेन में मिला था। मिला क्या था, मैंने उसे सुना भर था। वो कह रहा था कि गांधी परिवार आखिर क्यों घोटाले करेगा? वो लोग वैसे ही इतने रईस हैं, उनको क्या ज़रूरत पड़ी है चोरी करने की? मगर ये बात लोग समझते ही नहीं हैं। इसी चक्कर में कांग्रेस चुनाव हार गई थी।

रही बात नरेंद्र मोदी की तो वो अगर गलवान वैली चीन को दे देते हैं तो इसे रईसी नहीं कहा जाएगा। इसे सरेंडर ही कहा जाएगा, क्योंकि मोदी का बचपन गरीबी में बीता है और गरीब आदमी भले ही देश का प्रधानमंत्री क्यों न बन जाए, सरेंडर ही कर सकता है, दान नहीं दे सकता। उसकी नीयत ही नहीं होती दान देने की। और ऊपर से मोदी जी बचपन से ही सरेंडर करना भी चाहते थे, मगर राहुल गांधी ने बीच में आकर गड़बड़ कर दी। अच्छा-खासा सरेंडर का सीन चल रहा था और वो बीच में पता नहीं कहां से सुरेंदर भाई को ले आए।

यही क्या कम था कि ऊपर से संजुक्ता बासु आ गईं। वो राहुल गांधी के इस ह्यूमर पर लहालोट होकर कह रही हैं कि इस ह्यूमर को समझना इस देश के लोगों के स्तर से ऊपर की बात है। सही बात है, हमें ह्यूमर समझ आता ही कहां है, संजुक्ता जी को आता है। मेरा सुझाव है कि मोदी जी को एक ह्यूमर मंत्रालय खुलवाकर राहुल गांधी को उसका मंत्री और संजुक्ता बासु को उसका पीआर नियुक्त कर देना चाहिए।

और कुछ नहीं तो देश के लोगों का मन लगा रहेगा। बाकी हमारा क्या है, हम चीन तो क्या, नेपाल को भी अपनी ज़मीन देने को तैयार हैं। नेहरू जी ने ऐसे ही थोड़े न नेपाल का भारत में विलय का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया था। वो दूरदर्शी थे, वो जानते थे कि कल को नेपाल इतना सक्षम हो जाएगा कि खुद हमारा विलय करवा लेगा। कायदे से उन्होंने नेपाल का प्रस्ताव अस्वीकार करके उसे आत्मनिर्भर बनने की राह दिखाई थी। आत्मनिर्भरता का वही कॉन्सेप्ट आज मोदी जी चुरा लाए। मोदी जी चोरी कर सकते हैं क्योंकि उनका बचपन गरीबी में बीता है। गांधी परिवार चोरी नहीं कर सकता क्योंकि वो खुद में धनकुबेर हैं। उन्होंने बस वही चुराया जो उनके पास नहीं था- गांधी।

ट्रेन में वो आदमी सच ही कह रहा था, अमीर लोग चोरी नहीं करते। मगर जब अमीर लोग चोरी नहीं करते तो इन कम्युनिस्टों को पूंजीवाद से इतनी दिक्कत क्यों है? वो क्या चाहते हैं कि समाज में गरीब चोरों का दबदबा हो या ईमानदार अमीरों का?

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