सबसे ख़तरनाक है समस्या का बाज़ार बन जाना!
समस्याओं का जब बाज़ार बन जाता है तो वो बाज़ार कभी भी समस्या का समाधान ढूंढने नहीं देता। यही डर मुझे Air pollution को लेकर भी है। अगर जल्द ही Air purifier का बाज़ार बन गया तो वो बाज़ार कभी इस समस्या का समाधान नहीं ढूंढने देगा। बाज़ार बनने पर इससे जुड़ी कंपनियों के पास पैसा आता है और उस पैसे से वो कंपनियां कभी भी नीति निर्धाारकों को इलाज़ ढूंढने नहीं देती।
कैंसर से जुड़ी दवाओं का बाज़ार खरबों डॉलर का है। एक से ज़्यादा बार ये बात कही जा चुकी है कि इसी बाज़ार के चलते कैंसर का प्रभावी इलाज कभी सामने नहीं लाया जाता। यही बात अमेरिका में गन कल्चर को लेकर भी है। हिंदुस्तान में भी जब से water purifier अपर मिडिल क्लास की पहुंच में आया है तब से पीने के साफ पानी की समस्या सवाल ही नहीं रह गई। इस पर कहीं कोई चर्चा सुनाई नहीं पड़ती। कारण-क्योंकि यही वो वर्ग है जो सवाल पूछने की हैसियत रखता है, किसी भी चीज़ को मुद्दा बना सकता है मगर जिस वक्त ये वर्ग पैसे से समस्या का इलाज खरीदकर साइड हो जाता है उसके साथ ही उस समस्या की चर्चा भी गायब हो जाती है।
अपर मिडिल क्लास सवाल पूछता नहीं। लोअर और लोअर मिडिल क्लास के सवाल के मायने नहीं, सरकारों को अपनी तरफ से ज़रूरत नहीं लगती, ज़रूरत भी लगती है तो समस्या का बाज़ार बना देने वाली कंपनियां उसका जवाब ढूंढने नहीं देती और आखिरकार समस्याएं वहीं की वहीं खड़ी रहती हैं और गरीब आदमी उन समस्याओं को अपनी नियति मानकर उसके साथ सारा जीवन गुज़ार देता है।
क्या वजह है कि सालों बाद भी कश्मीर की समस्या हल नहीं हुआ? राम मंदिर नहीं बना? हिंदु मुसलमान के सवाल हल नहीं हो रहे? कारण वही है। जिन लोगों को इस बारे में कुछ करना था उनके लिए ये समस्याएं बहुत बड़ा बाज़ार बन गई हैं और वो इतने मूर्ख नहीं है कि इसका इलाज ढूंढकर अपने ही हाथों अपना बाज़ार गंवा दें।
समस्याओं का जब बाज़ार बन जाता है तो वो बाज़ार कभी भी समस्या का समाधान ढूंढने नहीं देता। यही डर मुझे Air pollution को लेकर भी है। अगर जल्द ही Air purifier का बाज़ार बन गया तो वो बाज़ार कभी इस समस्या का समाधान नहीं ढूंढने देगा। बाज़ार बनने पर इससे जुड़ी कंपनियों के पास पैसा आता है और उस पैसे से वो कंपनियां कभी भी नीति निर्धाारकों को इलाज़ ढूंढने नहीं देती।
कैंसर से जुड़ी दवाओं का बाज़ार खरबों डॉलर का है। एक से ज़्यादा बार ये बात कही जा चुकी है कि इसी बाज़ार के चलते कैंसर का प्रभावी इलाज कभी सामने नहीं लाया जाता। यही बात अमेरिका में गन कल्चर को लेकर भी है। हिंदुस्तान में भी जब से water purifier अपर मिडिल क्लास की पहुंच में आया है तब से पीने के साफ पानी की समस्या सवाल ही नहीं रह गई। इस पर कहीं कोई चर्चा सुनाई नहीं पड़ती। कारण-क्योंकि यही वो वर्ग है जो सवाल पूछने की हैसियत रखता है, किसी भी चीज़ को मुद्दा बना सकता है मगर जिस वक्त ये वर्ग पैसे से समस्या का इलाज खरीदकर साइड हो जाता है उसके साथ ही उस समस्या की चर्चा भी गायब हो जाती है।
अपर मिडिल क्लास सवाल पूछता नहीं। लोअर और लोअर मिडिल क्लास के सवाल के मायने नहीं, सरकारों को अपनी तरफ से ज़रूरत नहीं लगती, ज़रूरत भी लगती है तो समस्या का बाज़ार बना देने वाली कंपनियां उसका जवाब ढूंढने नहीं देती और आखिरकार समस्याएं वहीं की वहीं खड़ी रहती हैं और गरीब आदमी उन समस्याओं को अपनी नियति मानकर उसके साथ सारा जीवन गुज़ार देता है।
क्या वजह है कि सालों बाद भी कश्मीर की समस्या हल नहीं हुआ? राम मंदिर नहीं बना? हिंदु मुसलमान के सवाल हल नहीं हो रहे? कारण वही है। जिन लोगों को इस बारे में कुछ करना था उनके लिए ये समस्याएं बहुत बड़ा बाज़ार बन गई हैं और वो इतने मूर्ख नहीं है कि इसका इलाज ढूंढकर अपने ही हाथों अपना बाज़ार गंवा दें।
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| Article written by Ankesh Singh (Media Student) |


