घमंड की स्याही से जब पुलिस की वर्दी को रंग दिया जाए तो फिर भारत में भी चीन जैसा दृश्य नजर आता है। दूसरी ओर अगर एक पत्रकार विपक्ष की बात को चिल्ला चिल्ला कर दबाने का प्रयास करे या फिर सवाल पूछने वाले को ही गलत बताए ये भी पत्रकारिता के मूल भूत सिद्धांतों के विपरीत है। जब पत्रकार की आवाज़ को सत्ता के आतंक से दवा दिया जाए ये भी शायद एक प्रकार से लोकतंत्र की हत्या है।
महाराष्ट्र में जिसकी लाठी उसकी भैंस और पूछता है भारत में चिल्ला चुल्ली मचाओ शोर तो आखिर इसमें नुकसान किसका हो रहा है ? सत्ता के घमंड मे चूर नेताओं का या फिर पत्रकारिता के उसूलों को मिट्टी में मिलाने वालों का ? कॉम्पटीशन की अंधी प्रतिस्पर्धा में पत्रकार जब पत्रकार की आवाज़ को दबते देख मूह में ताला लगा ले इससे ज्यादा शर्म की क्या बात है?
आखिर इस तरह के रवये का विरोध क्यूं नहीं ? मगर दूसरी ओर राष्ट्रवाद की परिभाषा के सहारे किसी पार्टी विशेष के प्रोपगेंडा चलाते पत्रकारों पर भी सवाल क्यों नहीं ? वैसे भी पीठ पीछे वार करने वाला शेर नहीं गीदड़ होता है दूसरी तरफ किसी अपराध के खुलासे की जड़ों को टटोलने वाले व्यक्ति के साथ की जाए बदसलूकी ये भी कितना जायज़ है? देश में राजनीतिक शक्तियों के दुरुपयोग का नज़ारा नया नहीं है जब तक जनता अपने निजी स्वार्थ के लिए और पत्रकार ख्याति के लिए अपने जीवन को आगे की ओर लेजाएंगे तब तक शायद सत्ता का घमंड इसी तरह के नज़ारे प्रस्तुत करता रहेगा। देश में असली में क्या चल रहा है ये आप किसी नेता से पूछेंगे या पत्रकार से पूछेंगे दोनों ऐसा विश्लेषण देंगे जिससे आप सच्चाई से दिग्भ्रमित हो जाएंगे और आप नेता को वोट देकर और पत्रकार को टी आर पी की होड़ में जगह बनाने का मौका देंगे। ऐसा नहीं कि हिन्दुस्तान के सभी नेता भ्रष्ट और पत्रकार चाटुकार है ये केवल हम सब लोगों का भ्रम है और अपने अधिकारों को निजी स्वार्थ के चक्कर में बेच देने का नतीजा है। अर्णव जी के राष्ट्रवाद की पत्रकारिता का पूरा देश सराहना करता है मगर सवाल ये भी पूछता है कि वे आर्टिकल 15 के गलत तरह से प्रयोग क्यूं करते है ?।
हम सभी जानते है कलम की ताकत तलवार से भी ज्यादा होती है मगर तब जब कलम की निप का झुकाव शब्दों की सच्चाई की तरफ की बजाय कागज की तरफ हो तो शायद देश में विपरीत स्थिति उत्पन्न होना तय है। सुशांत मामले में अर्णव जी के अथक प्रयासों को देश के
बुद्धजीवियों ने नकारा ये भी शर्म की बात है। अब देश के संविधान के रखवाले चुप क्यों? देश कब तक जलता रहेगा उग्रवाद की भट्टी में?
