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जाने सरकारी तंत्र का प्राइवेटाइजेशन क्या होता है और कैसे होता है और उसके फायदे नुकसान क्या है

भारत की वर्तमान मोदी सरकार पर आए दिन आरोप लगते रहते है कि ये उद्योगपति की सरकार है या भारत सरकार सब कुछ बेच रही है लेकिन ऐसा नही है भारत सरकार या दुनिया की कोई भी सरकार जिसके पास काफी सरकारी फण्ड नही होता है जिससे कि वो देश का विकास भी सुचारू रूप से कर सके और वर्ल्ड बैंक से कर्ज भी न लेना पड़े भारत जैसे विशाल देश की सबसे बड़ी समस्या है आज के समय है वर्ल्ड बैंक के कर्ज को भरना इस कर्ज़ को भरने से बचने के लिए किसी भी देश की सरकार पीपीपी मॉडल अपनाती है ताकि समय से सही विकास हो और देश वर्ल्ड बैंक या चीन जैसी हड़प करने वाले देशों के कर्ज के तले न दबे आइये जानते है पीपीपी मॉडल किसे कहते है और क्या है इसकी खासियत

पीपीपी परियोजना का अर्थ है किसी भी परियोजना के लिये सरकार या उसकी किसी वैधानिक संस्था और निजी क्षेत्र के बीच हुआ लंबी अवधि का समझौता। इस समझौते के तहत शुल्क लेकर ढांचागत सेवा प्रदान की जाती है। इसमें आमतौर पर दोनों पक्ष मिलकर एक स्पेशल परपज व्हीकल (एसपीवी) गठित करते हैं, जो परियोजना पर अमल का काम करता है। दोनों पक्षों के बीच जिस समझौते पर हस्ताक्षर होते हैं, उसे मॉडल कंसेशन एग्रीमेंट कहा जाता है। 

आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया ने जब गति पकड़ी, तब देश के ढाँचागत क्षेत्र में बदलाव आना शुरू हुआ और इस क्षेत्र में विकास के लिये सार्वजनिक निजी भागीदारी का निवेश मॉडल काफी लोकप्रिय बनकर उभरा है। आज अवसंरचना के कई महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों, जैसे- सड़क, रेल, नवीकरणीय ऊर्जा, बंदरगाह, हवाई-अड्डा, पाइपलाइन और शहरी ढाँचागत क्षेत्र आदि में निवेश के लिये पीपीपी मॉडल को बढ़ावा दिया जा रहा है।  

लाभ-

पीपीपी मॉडल अपनाने से परियोजनाएँ सही लागत पर और समय से पूरी हो जाती हैं। परियोजनाओं से होने वाली आय भी समय से शुरू हो जाती है, जिससे सरकार की आय में भी बढ़ोतरी होने लगती है।   
परियोजनाओं को पूरा करने में श्रम और पूंजी संसाधन की प्रोडक्टिविटी बढ़ाकर अर्थव्यवस्था की क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। 
पीपीपी मॉडल के तहत किये गए काम की गुणवत्ता सरकारी काम के मुकाबले अच्छी होती है और साथ ही काम अपने निर्धारित योजना के अनुसार होता है।

हालाँकि कुछ विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में पीपीपी परियोजनाओं से जुड़ी कुछ नकारात्मक प्रवृत्तियाँ भी हैं, जैसे- दोषपूर्ण रिस्क शेयरिंग, अयोग्य बिजनेस मॉडल और वित्तीय अस्थिरता आदि, जिसकी वजह से निजी कंपनियाँ कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने के बाद निवेश बाहर निकाल देती हैं। पीपीपी के किसी भी प्रोजेक्ट के लिये काफी हद तक निजी क्षेत्र, बैंक कर्ज़ पर निर्भर रहते हैं। बैंकों का अपना क्षेत्रवार लक्ष्य होता है, जिसके पूरा हो जाने के बाद पीपीपी प्रोजेक्ट के लिये कर्ज़ मिलना मुश्किल हो जाता है।

महत्त्व

सार्वजनिक परियोजनाओं में पीपीपी के होने से मुख्य फायदा यह होता है कि निजी कंपनियाँ डिज़ाइन, निर्माण और संचालन की उत्कृष्ट कार्यकुशलता सार्वजनिक सेवा के लिये लाती हैं। ऐसा तर्क दिया जाता है कि निजीकरण से परियोजना संचालन में ज्यादा कुशलता आती है जिससे परियोजना लागत में बचत और लाभ अधिकतम होता है।

पीपीपी मॉडल के पक्ष में एक प्रमुख दावा यह भी किया जाता है कि चूँकि इस मॉडल में निजी वित्तीय संसाधनों का उपयोग होता है जिससे परियोजना में सार्वजनिक संसाधन लगाने ही नहीं पड़ते हैं। ये बचे हुए सार्वजनिक संसाधन सरकार की दूसरी नीतिगत प्राथमिकताओं के लिये काम में लाए जा सकते हैं। 

कुल मिलाकर किसी भी देश मे विकास पीपीपी मॉडल से बहुत तेज़ी से होता है लेकिन सरकार को इसपर काबू रखना बहुत जरुरी है ताकि निजी कंपनी लोगो का शोषण ना करें। सरकार को विकास भी करना होता है अपने लोगो को ऊपर भी उठाना होता है और सरकार को अपनी कमाई का जरिया(किसी व्यक्तिगत नेता का नहीं) भी देखना होता है साथ ही साथ लोगो तक सभी सुविधाएं सही से पहुँचे इसका भी ध्यान देना होता है।

 उदहारण के तौर पर देखे तो अमेरिका, रूस, फ्रांस, ग्रेट ब्रिटेन, जैसे देश जो हथियार बनाने में माहिर है सभी देशो में प्राइवेट कंपनिया ही हथियार बनाती है लेकिन इन्हें कहा बेचना है इसका फैसला सरकार करती है सरकार ही किसी हथियार को खरीदने का आर्डर भी लेती है। वही भारत मे देखे तो कुछ महीने पहले ही भारत ने करीब 960 करोड़ का गोल बारूद जिसमे अधिकतर ग्रेनेड, लैंड माइंस, माइंस इत्यादि चीज़े जलानी पड़ी साथ ही साथ भारत हो ऑर्डिनेंस फैक्ट्री हमेशा घाटे में चलती है। लेकिन समान खराब होने के बाद भी भारत की मिलिट्री को ये समान खरीदना पड़ता है। ऐसा नही है कि ये केवल खराब समान ही बनती है ये सामान महंगे भी होते है करीब 40% से 90% बाकी सामानों से। तो देखा जाए तो ऐसे सरकारी तंत्र देश को कही न कही से खोखला कर रहे है। ऐसे में पीपीपी मॉडल बहुत काम आता है। 

अब आप सोचिये की भारत की मिलिट्री कितनी बहादुरी से लड़ती है लेकिन अगर सामने से दुश्मन चल कर आये और हमारे फौजी भाइयो की बंदूके ही न चले तो ये बहादुरी नहीं बेवकूफ ही कही जाएगी और इसी तरह से सालो से भारतीय सेना की जड़ो को अंदर के लोग खोखला करते आ रहे है। और ऐसे कई उदहारण मौजूद है। दिक्कत ये है कि सरकारी नौकरी में अधिकतर लोग काम न भी करे तो उन्हें उनकी तनख्वाह मिलती रहती है और ये गलत भी नही है गलत ये है कि इसका ज्यादा से ज्यादा दुरुपयोग किया जा रहा है और लोग करते आ रहे है। इसका निवारण करने के लिए पीपीपी मॉडल सबसे उपयुक्त है। 

ऑर्डनेन्स फैक्ट्री पर लेख किसी और दिन फिलहाल ऑर्डनेन्स फैक्ट्री के उदहारण से ये समझ सकते है कि सरकारी नौकरी करने वाले लोग किस तरह से देश के जड़ो को खोद सकते है और सालो से खोदते आ रहे है। लगभग 1.5 से 2 गुना खर्च करने के बाद भी समान में गुडवत्ता हमारी फौज को नही मिल पा रही है। इसलिए भारत मे बहुत से चीज़ों को पीपीपी मॉडल जिसपर सरकार का आधिपत्य हो बहुत जरुरी है।

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