प्रतिमाओं में शिव को मुख्यता चार रूपों में दर्शाया जाता है। संहार मूर्ति, जिसमें वो चारभुजाधारी, अष्टभुजा धारी या दशभुजा धारी रुप में असुरों का संहार करते दिखते है।अनुग्रह मूर्ति, जिसमे शिव वरदान देते नजर आते है। नृत्यमूर्ति, जिसमे शिव नृत्य करते दिखते है और दक्षिणमूर्ति जिसमें वो एक योगी के रूप में दर्शाए जाते है। ये मूर्ति जो आप देख रहे हैं ये गजासुरसँहार मूर्ति जो अपने आप में अद्भुत है। उत्तर भारत मे शिव का ये रूप कम ही देखने को मिलता है लेकिन दक्षिण भारत मे उनके गजसँहार करते अनेक मंदिर औऱ मूर्तियाँ है। शिव के गजासुरसँहार स्वरूप का मुख्य मंदिर कर्नाटक में है।
ये मूर्ति भी दक्षिण भारत के चोला वंश के समय बने हैलेबिड्ड मंदिर से है। इस मूर्ति में शिव के चारों रूप एक साथ दर्शाए गए है। इसमें वो गजासुर का संहार कर रहे है, नृत्य कर रहे है, गजासुर को आशीर्वाद दे रहे हैं औऱ योगी भी है।
शिव के हाथ मे अस्त्र शस्त्र है। उनके हाथों के भुजंगवलय एकदम परफेक्ट है।साँप की पूछ जहाँ उसके शरीर से मिले वहीं साँप का फन उठा होना चाहिए। उनका बायां पैर ग़ज़ के सर पर है। एक नाखून से वो ग़ज़ की चमड़ी खींच रहे है अर्थात बड़ी ही बेहरमी से उसका संहार कर रहे है इसलिए शिव को गजारी भी कहा जाता है, ग़ज़ से शत्रुता रखने वाला। ये उनका रौद्र रूप है, संहार मूर्ति स्वरूप। उनका दायां पैर उत्कुटिकासन की मुद्रा में मुड़ा हुआ है, हाथों का संयोजन, पैरों का लयबद्ध तालमेल तांडव को दर्शाता है, नृत्य मूर्ति को।
ग़ज़ पूरी तरह धराशाई है, उसके पैर आसानी से देख सकते है।।उसने धातु का मुकुट और धातु कुंडल पहन रखे है। उसकी पूछ भगवान शिव के सर के ठीक पीछे है। ग़ज़ की खाल अर्थात चामृ को शिव के चारों तरफ उनके आभामंडल के रुप में दर्शाया गया है। पौराणिक कहानी के अनुसार शिव ऐसा गजासुर को दिए वरदान के कारण कर रहे हैं जिसमे गजासुर ने अपने शरीर का कोई भी हिस्सा शिव से धारण करने का वरदान मांगा था ताकि लोग शिव के साथ उसे भी याद रखें। ये शिव का अनुग्रह स्वरूप है।
मगर इसमें उनका योगी स्वरूप कहाँ है..?
उनका योगी स्वरूप आप देख पाएंगे जब आप ये पढेंगे कि ये पौरणिक कहानी असली में किस घटना का विस्तार रूप है। जब आप इस मूर्ति में शिव का योगी स्वरूप देख लेंगे तो आप जान जाएंगे कि गजान्तकः और गजानन साथ क्यों है। तभी आप विनायक के धड़ पर ग़ज़ का सिर क्यों है ये रहस्य भी समझ पाएंगे और ये रहस्य छिपा है शिव के ही एक नाम "कृत्तिवासा" में।
कृत्तिवासा अर्थात जो ग़ज़ का चर्म धारण करे...!
